रविवार, 17 जनवरी 2010

बंदूक का विकल्प हो तो आदिवासी लौट आएगा

बंदूक का विकल्प हो तो आदिवासी लौट आएगा
रमणिका गुप्ता




पिछले पांच वर्षों में माओवादी आन्दोलन 10 से 20 राज्यों के 223 जिलों में फैल गया हैµयानी भारत के एक तिहाई भू-भाग में। इनमें अधिकतर जिले आदिवासी बसाहटों वाले हैं।

दरअसल नक्सलवाद ग्रामीण क्षेत्रा के किसानों से जुड़ा है। आदिवासी मूलतः किसान हैं। ज़मीन और जंगल के बिना आदिवासी की पहचान ही नहीं होती।

आदिवासी का मतलब होता है उनका जंगल, ज़मीन, उनकी बोली-भाषा और उनकी अपनी संस्कृति, अपनी जीवन शैली तथा उनका अपना शारीरिक गठन व नाक-नक्श। सरकार उनकी पहचान, भाषा व संस्कृति को ही नष्ट कर रही है, बाकी सब तो स्वतः नष्ट हो जाते हैं। कहावत हैµ‘‘किसी का़ैम को खत्म करना हो तो उसकी भाषा-बोली नष्ट कर दो।’’ आज सरकार यही कर रही है।

आदिवासी बसाहटों में जो प्रायः देश के खनिज और जंगलों से भरे समृद्ध क्षेत्रा ही होते हैं, में बाहरी लोगों की घुसपैठ बढ़ने के साथ उनकी बेरोज़गारी, भुखमरी और गरीबी बढ़ी, जिससे असंतोष पनपा। आदिवासी को पुलिस, ज़मींदार, सूदखोर और ठेकेदार लूटते रहे हैं। कोई भी समस्या होने पर पुलिस दोनों पार्टी से पैसा लेकर ग्रामीणों का शोषण करती है। उनके पास कोई विकल्प नहीं बचता। राजनैतिक दल भी उनकी समस्याओं को अपने लाभ के लिए तो उठाते हैं, पर उनका निराकरण नहीं कर पाते। समाज और सरकार ने उनका दमन व शोषण करने वाली शक्तियों को और भी अधिक बलवान किया है। दलालों की, खासकर राजनैतिक दलालों की संख्या झारखण्ड या आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में इतनी बढ़ गई है कि आदिवासी समझ ही नहीं पाताµकिस तरफ जाए, क्या करे, क्या न करे? और जब उसे कोई रास्ता नहीं सूझता, तो वह नक्सलवाद की तरफ जाता है। नक्सलवाद के रास्ते से भले हम सहमत न हों, पर चारांे तरफ जब कोई मौत से घिरा होµइधर कुँआ हो, उधर खाई होµतो वह जिधर राह पाता है, उधर चला जाता हैµयह जानते हुए भी कि वहाँ मौत मुँह बाए खड़ी है! पर क्या करे वह? उधर यदि वह न भी जाए, तो इधर भी कहाँ है समाधान? इधर नक्सलवाद में मौत है, तो उधर व्यवस्था में भी मौत ही हैµजो हर क्षण उसके स्वाभिमान को भी मारती है। फलतः वह मारकर मरने का रास्ता चुनता है। नक्सलवाद में उसे रोशनी की एक किरण दिखती है। नक्सलवादी रास्ता उसके लिए अंततः सम्मान और स्वाभिमान का रास्ता बन जाता है। वह शोषण से मुक्ति और सम्मान से जीना चाहता है। मुझे यह कहने में संकोच नहीं कि नक्सलवाद, प्रताड़ित एवं शोषित ग्रामीण किसानµखासकर आदिवासी युवा किसानों में पनप रही हताशा और खालीपन को भरता है। जब इनकी किसी भी समस्या को दूर करने के लिए कोई सामने नहीं आता, तब वह किसकी तरफ देखे?



सरकारी हिंसा

सरकार बार-बार कहती है नक्सली अपनी हिंसा छोड़ें तब वार्ता होगी। सरकार को अपनी हिंसा पर भी तो नकेल लगानी होगी? प्रधानमंत्राी नक्सली आन्दोलन को देश का सबसे बड़ा आन्तरिक खतरा घोषित करते हैं और गृह मंत्राी उन्हें कुचलने का ऐलान करते हैं! आदिवासी क्षेत्रों में मुठभेड़ों में हत्याएं, थानांे में थर्ड डिग्री अख्तियार कर हत्याएं, झूठे मुकदमे में निर्दोषों, मुखर और जागरूक व्यक्तियों को फंसाना तो आम बात है। जो सवाल करे उसे ही नक्सल कह देना या अपराधियों को भी नक्सल कहकर खानापूर्ति करना भी सहज बात है। यह सही है हिंसा कोई समाधान नहीं, लेकिन सरकारी हिंसा भी तो आदिवासियों की मांगों का समाधान नहीं है? शोषकों के साथ मिलकर जनता कोµखासकर आदिवासियों पर जुल्म करती है प्रशासन एवं पुलिस। न्यायालय से न्याय में देरी होने या न मिलने पर और निर्दोष को बिना वजह पुलिस द्वारा प्रताड़ित किये जाने से भी असंतोष पनपता है। आदिवासियों व वंचित जमातों में पनप रहे असंतोष का परिणाम हैµनक्सलवाद। इस असंतोष के मुख्य कारण हैंµसरकार के भूमि संबंधी कानून में सुधार की बजाय जमींदारों व दलालों को जमीन के स्वामित्व का अधिकार देना व आदिवासी संबंधी नीतियों को लागू करने में इच्छा-शक्ति की कमी तथा आदिवासियों की जल-जंगल-जमीन से बेदखली, विस्थापन, पलायन, घुसपैठ और उपेक्षा।



सलवाजुडूम

आजकल तो सरकार ने नक्सलवाद को खत्म करने के लिए सलवाजुडूम को खड़ा कर दिया है। सलवाजुडूम बनाने का उद्देश्य ही है, आदिवासी को आदिवासी के खिलाफ़ लड़वाना। छत्तीसगढ़ में शांति के नाम पर आदिवासी को खत्म किया जाता रहा है। सरकार वहाँ पर नक्सलवाद को नहीं, आदिवासियों को खत्म कर रही है। दरअसल ये आदिवासियों के हिंदूकरण का नायाब राजनैतिक तरीका है।



विकास से विस्थापन

आज झारखण्ड के 24 में से 22 जिलों में नक्सलवाद है। आदिवासियों का जंगल, ज़मीन पर अधिकार तो क्या--उनके प्रवेश तक पर रोक है। कारखानों का विकास हो या कोयला, माइका, मैगेनीज़, यूरेनियम खदानों अथवा बडे़-बडे़ बांधों काµइनके चलते वहां के स्थायी निवासी, खास कर देशज व आदिवासी ही विस्थापित हुए हैं। बांधों में आदिवासियों की बसाहटें व खेत तो डूबते हंै, पर सिंचित नहीं होते। सिंचित होते हैं दूसरे राज्यों के गैरआदिवासियों के खेत। इनके बिजलीघरों से आदिवासियों के घरों में बिजली तक मुहैया नहीं होतीµबिजली चली जाती है शहरों या दूसरे राज्यों में। यानी आदिवासी का नुकसान दूसरों का लाभ बन जाता है। एक तबके की कीमत पर दूसरा तबका पनप रहा है। जब झारखंड में पतरातू डैम बना तो डैम से सटे पतरातू, सांकुल व अन्य कई गांवों ने वर्षों तक बिजली का मुंह नहीं देखा। यहां तक कि पीने का पानी भी उन्हें मुहैया नहीं किया गया। ये तो 90 के दशक में हम लोगों ने जब पानी और बिजली की लड़ाई लड़ी, तो वहां कुछ राहत मिली। आदिवासी क्षेत्रा का कोयला दिल्ली तक पहुँच रहा है। झारखंड खनिज के मामले में मालामाल है। फिर भी वहाँ का आदमी सबसे गरीब है। आखिर यह विकास हम किसके लिए और क्यों करते हैं? जहां विकास होता है वहां के स्थानीय लोग तो बस विस्थापित होने का दंश झेलते हैं। न उन्हें मुआवजा मिलता है, न ही रोजगार! मिलता है विस्थापन और पलायन। किसी भी परियोजना से पहले जरूरी होता है, उन लोगों को बसाने की प्रक्रिया का पूरी तरह से सम्पन्न होना। लेकिन हो रहा है उल्टा। अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी होने से पहले सरकार जमीनें ले लेती है। अधिग्रहण के पहले तो क्या बाद में भी, पुनर्वास की कोई व्यवस्था नहीं होती। आखिर ये बड़े-बड़े बाँध किसके लिए बनते हैं?

अभी तक झारखंड के मैथन डैम, जिसे नेहरू जी ने विकास का मंदिर कहा था, के विस्थापितों के मुआवजे पर विवाद चल रहा है। कई कोयला खदानों के मुआवजे के मामले अभी तक लम्बित हैं।



आदिवासियों में चेतना के प्रेरक

इधर आदिवासियों में चेतना ही नहीं, अधिकार-चेतना भी आई है। वह अपने हक़ की बात करने लगे हैं। जहां-जहां नक्सलवाद है, वहां-वहां अवैध जंगल कटने पर रोक लगी है, अपराधियों द्वारा बसें लूटने पर रोक लगी है। आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन और लाठा-छावन और जलावन के अधिकारों के लिए बिहार, झारखंड में समाजवादी और वामपंथी पार्टियों ने ही पहले पहल वहां संघर्ष शुरू किया, जो बाद में आन्दोलन के मुद्दे बदलने के कारण अलग-थलग पड़ गया। जल-जंगल-जमीन व सूदखोरी तथा घुसपैठियों के आंदोलनों के बरक्स खड़े हो गये अलग राजµआरक्षण जैसे मुद्दों के आंदोलन।

हालांकि ये मुद्दे भी जरूरी थे लेकिन इन सब के मूल में था विस्थापन और उससे पैदा हुई बेरोजगारी और पलायन तथा स्थानीय लोगों की नौकरी, शिक्षा व स्वास्थ्य में उपेक्षा को लेकर असन्तोष। बड़ी-बड़ी परियोजनाएं बनीं पर देशज लोग नौकरियां नहीं पा सके। जमीनों का बिना नोटिस जबरन अधिग्रहण और प्रशासन व पुलिस के शोषण तथा परियोजनाओं में उपेक्षा ने आग में घी में काम किया।

आदिवासियों में चेतना लाने का श्रेय जहां वहां की समाजवादी या वामपंथी श्रमिक यूनियनों या विभिन्न वामपंथी, राजनैतिक दलों को जाता है, जिन्होंने जल-जंगल-जमीन, डिमार्केशन व स्थानीय की नौकरी के मुद्दों पर आन्दोलन किया अथवा विस्थापन के विरुद्ध कोल-इंडिया के खिलाफ मोर्चा लिया, वहीं झारखण्ड पार्टी, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा तथा आजसू जैसी क्षेत्राीय पार्टियों द्वारा चलाई गई अलग राज की मुहिम ने भी उनमें चेतना जगाने में अहम् भूमिका निभाई। फ़र्क़ यही रहा कि इन दलों की ये लड़ाइयां केवल सत्ता पाने की बन कर रह गईं और आदिवासियों के अधिकारों एवं व्यवस्था में बदलाव के मुद्दे गौण हो गए। अलग राज्य यानि सत्ता का मुद्दा अहम् हो गया। इस लड़ाई में अदिवासियों का शोषण करने वालेे लोग भी झारखंडी संस्कृति के नाम पर आंदोलन का नेतृत्व करने लगे। इस कारण और भी अधिक भ्रम बढ़ा। फलतः अलग राज से भी उन्हें अधिकार नहीं मिला, उल्टे भ्रष्टाचार हद से ज्यादा बढ़ गया। विस्थापन रुकने की बजाय और बढ़ गया जब औद्योगीकरण के नाम पर दर्जनों एग्रीमेंट साइन हो गए।

आठवें दशक में बड़े-बड़े सामूहिक आंदोलन हुए थे, जिनसे कुछ राहत अवश्य मिली थी, किन्तु सरकारी नीतियां जस-की-तस रही थीं। जनता को लगा कि वे कितना भी आंदोलन करें, नतीजा तो कुछ निकलता नहीं। सरकार तभी मानती है जब हिंसा होती है। इसके कई प्रमाण भी देखने को मिलते हैं। नतीजा हुआµगुरिल्ला युद्ध, नक्सलवाद, बन्दूक, जो कभी गृहयुद्ध का रूप भी ले सकता है!



आन्तरिक उपनिवेशवादी मानसिकता तथा घुसपैठ

भारत में आदिवासियांे के शोषण के लिए जितना विदेशी उपनिवेशवाद दोषी है, उससे ज्यादा आन्तरिक उपनिवेशवाद दोषी है। आदिवासी बसाहटों मंे भारती प्रशासकों द्वारा दमन एवं शोषण तो होता ही रहाµसाथ ही शेष भारत के लोगों की उपनिवेशवादी मानसिकता के कारण आदिवासी अपने समृद्ध संसाधनों से वंचित होता गया। घुसपैठियों ने न सिर्फ इन्हें हेय करार किया बल्कि उनके मन में अपनी संस्कृति के प्रति हीन-भावना भी भरीµऔर ‘हम’ और ‘वे’ के विभेद को हवा दी। नक्सलवाद की जड़ में केवल आर्थिक शोषण ही नहीं हैµउसमें सामाजिक विभेद और अन्याय के साथ-साथ अपनापे की कमी भी शामिल है। इसका निराकरण सत्ता की बन्दूकें नहीं कर सकतीं। सत्ता की नेक-नियति और इच्छाशक्ति ही इसकी भरपाई कर सकती है। दुर्भाग्यवश यह प्रयास अभी तक दिखाई नहीं दिया।

दरअसल आदिवासी बसाहटों में ‘घुसपैठ’ सबसे ज्यादा घातक सिद्ध हुई है। नेहरू जी ने कहा था कि इन्हें अपनी तरह जीने दो। इन पर अपनी संस्कृति मत थोपो। लेकिन हुआ ठीक इससे उलट। भारत के शेष भाग के लोग घुसपैठ तो करते ही हैं, लेकिन बंगलादेश से भी भारी संख्या में हुई घुसपैठ ने आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों का संतुलन बिगाड़ दिया। झारखंड में भारत के अन्य राज्यों व बिहार के अन्य जिलों से लोग आकर बसते गए। वे या तो परियोजनाओं में रोजगार की खोज में आए या व्यापार के लिए। वे अपने साथ लठैतों, पहलवानों की जमात भी लाए। व्यापार केवल व्यापार तक ही सीमित नहीं रहा। यह व्यापार आदिवासियों के जंगलों, जमीनों तथा उनकी औरतों के शोषण, दोहन और कब्जे का जरिया भी बन गया। घुसपैठ से आदिवासियों की जनसंख्या का संतुलन बिगड़ गया। वे अपने ही घर में अल्पसंख्यक हो गए। कल के किसान आज के भूमिहीन बन गए या कोयलाचोरों के औजार। इस घुसपैठ के चलते उनके क्षेत्रों की आबादी बढ़ गई और संसाधन कम हो गए। विकास का फल उन्हें न मिलकर बाहर से आए लोगों को मिलने लगा। उनके खुद के रोजगार व विकास के लिए कुछ नहीं हुआ। नतीजा हुआµअसंतोष! असंतोष मायनेµविद्रोह! और नक्सलवादी आंदोलन को इस असंतोष का लाभ मिला। इसी के चलते अलग राज्य का नारा भी लगा लेकिन अलग राज से भी आदिवासियों को राहत नहीं मिली। अगर सरकार चाहती, तो आदिवासियों का विस्थापन और बहिरागतों की घुसपैठ रोकी जा सकती थी। त्रिपुरा की वाम सरकार की तर्ज पर यहां भी स्वायत्त शासन और अनुसूचित अधिनियम की 5वीं व 6ठी धारा लागू करके आदिवासियों की जमीनें वापस करवाईं जा सकती थीं। उन्हें अन्य सुविधाएं भी दिलवाईं जा सकती थीं। साथ ही दूसरे कमजोर व गरीब लोग, जो उनकी जमीनांे पर काबिज थे, की वैकल्पिक व्यवस्था भी की जा सकती थी ताकि सामंजस्य बना रहे। ऐसा सभी आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में किया जा सकता था पर ऐसा हुआ नहीं।

ऐसे तो महाभारत काल से ही घुसपैठ चलती रही है। त्रिपुरा की तरह ही अन्य आदिवासी क्षेत्रों में भी पिछले 3 हजार वर्षों से राजाओं की भूमिका रही है। वहां राजा खुद को सूर्यवंशी कहते आए हैं। आजादी से पहले या आजादी के बाद इन राजाओं में अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए तो कलकत्ता या नजदीक के बड़े शहरों में भेज दिया, लेकिन प्रदेश की जनता को प्रिमिटिव अवस्था में ही बनाए रखा। वे झूम की खेती करते रहे, जंगल जलाते रहे, पर इन राजाओं ने इनकी पढ़ाई के लिए एक भी स्कूल नहीं खोला। केन्द्र सरकार ने भी बाहरी या भीतरी घुसपैठ को रोकने के लिए कभी गंभीर होकर प्रयास नहीं किया, जिसका नतीजा निकला असंतोषµजिससे जन्मा अलगाववाद!

पूर्वोत्तर मंे लगा अलगाववाद का नारा जो उग्रवाद के रूप में बदल गया और भारत से अलग होने की मांग करने लगा। बाकी आदिवासी क्षेत्रों में अलगाववादµभारत के संविधान के तहत ही केवल अलग राज्य तक सीमित है, लेकिन वह बदलाव चाहता है। बदलाव हो नहीं रहा। वह वोट दे-देकर सबको आजमा चुका है, फिर भी बदलाव नहीं आया। वह सशंकित हो उठा है। इस अविश्वास ने ही नक्सलवाद को जन्म दिया।



जंगल का व्यापारीकरण
जंगल, जिस पर उसकी रोज़ी रोटी निर्भर है को काटने में जंगल के ठेकेदार, पुलिस, नेता और माफ़िया की अहम् भूमिका है। जंगल के लिए सरकार की वर्तमान नीति, जिसके तहत जंगल एक व्यापारिक वस्तु हैµही सारी समस्या की जड़ है। इसी के तहत जंगल में आदिवासी-प्रवेश के निषेध का कानून बना। यह एक और बड़ा कारण हैµआदिवासी की हताशा का। अंग्रेज़ों ने जंगल का व्यापारीकरण किया। भारत सरकार ने अंग्रेज़ों की नीतियों को ही लागू किया है। जंगल बचाना, जंगल आधारित रोज़गार बचाना या पर्यावरण बचाना सरकार का उद्देश्य कभी रहा ही नहीं। सरकार जंगल बेचती है। फलतः जंगलवासियों के अधिकार कम-से-कमतर होते गए हैं। जंगल का व्यापार करने के लिए यूकेलिप्टस और सागवान लगाया गया, जबकि यूकेलिप्टस को पानी का दुश्मन माना जाता है। पर सरकार ने व्यापार के लिए ये पेड़ लगाए, जबकि आदिवासी जंगल में सखुआ, महुआ, आम, कटहल, नीम, बीड़ी पत्ता का पेड़, कुसुम व गरम्भार व शीशम के पेड़ लगाते थे, जिससे उनका पेट भी भरता था और रोजगार भी मिलता था। यह तो सर्वविदित है कि झारखंड में खनऩ के आधिक्य के चलते पानी के òोत या तो धरती में ही रुख बदल लेते हैं या फिर सूख जाते हैं। जनता का रोष इससे भी बढ़ा। रांची में लकड़ी की बड़ी-बड़ी टालें (दुकानें) हैं, जिनके मालिक मारवाड़ी व बाहर वाले हैं। इनमंे नेताओं की हिस्सेदारीे है। इस हिस्सेदारी में कतिपय आदिवासी नेता भी शामिल हैं। 70 के दशक में झारखण्ड में बहिरागतों के विरोध में नारा उठा था--‘लोटा-सोटा-झोटा झारखण्ड छोड़ो।’’ लोटा यानी मारवाड़ी, सोटा यानी बिहारी--खासकर आरा-छपरा-बलिया के लोग और झोटा यानी पंजाबी। ये लोग सूद का धन्धा भी करते हैं, इसलिए इन्हें ‘दिकू’ कहा जाता है। दस रुपये की लकड़ी जंगल से काटने के एवज में आदिवासी जेल जाता रहा है और आज भी जाता है। दूसरी तरफ ठेेकेदार जंगल का जंगल काट लेता है, किंतु उस पर कोई कार्यवाही नहीं होती।

जब मैं विस्थापितों और स्थानीयों की नौकरी के आंदोलन में हजारीबाग जेल में थी तो मुझे वहां ‘हड़िया’ बेचने वाली एक महिला मिली, जो 7 वर्षों से हजारीबाग जेल में थी, चूंकि उसके परिजन उसकी जमानत करवाने में सक्षम नहीं थे। इस जुर्म की सजा मात्रा दस दिन होती है। हमने उसकी जमानत करवाई। ऐसे अनेक आदिवासी जेलों में बरसों तक कैद रहे। बाहरी दलालों की जमात उनका इस्तेमाल कर उन्हें जेलों में छोड़ देती थी।



डिमार्केशन ने छीनीं आदिवासियों की जमीनें

70-80 के दशक में कई सामहिक आन्दोलन चले। हमने ‘लाठा, छावन और जलावन’ तथा ‘जल, जंगल, ज़मीन’ के लिए पूरे छोटानागपुर के पैमाने पर आन्दोलन शुरू किया था। उसी के तहत 1970 में डिमार्केशन और जंगल के सिपाहियों, जो सूखी लकड़ी को भी गीला करार देकर आदिवासियों पर दंड लगाते या गिरफ्तार कर जेल भेज देते थे--के खिलाफ हमने नारा दिया था--‘घूस नहीं अब घूंसा देंगे’, ताकि जंगल सिपाहियों के जुल्म को रोका जा सके। जंगल सिपाहियों ने उन दिनों जंगल में जाना ही बन्द कर दिया था। सरकार के साथ समझौते से डिमार्केशन की जमीनें भी ग्रामीणों को वापस दिलाई गई थीं। लेकिन समय के साथ उठने वाले ये सब आन्दोलन व्यक्तिगत आन्दोलन बन कर रह गये, क्योंकि सरकार ने अपनी नीतियां नहीं बदलीं। सरकार की नीति के कारण जंगल तो नहीं बचे, पर आदिवासी जरूर उजड़ गए। दरअसल आदिवासियों के पास पहले पूरा का पूरा गांव सामूहिक रूप से होता था। किसी के नाम से पट्टे नहीं होते थे। यह तो अंग्रेजों ने रेवल्यू सिस्टम बदला और जमींदारी प्रथा लागू कर व्यक्तियों के नाम से जमीनों का बन्दोबस्त कर दिया। लेकिन आदिवासी के नाम से पट्टे नहीं बने। डिमार्केशन के नाम पर गांव की शामलाट या गैरमजुरआ अथवा कोडकर राइट वाली या रैयती जमीनों पर खड़ी फसलें नष्ट करके कब्जे में लेने का काम भी जंगल के अधिकारी करते हैं, जिससे आदिवासी खुद को ठगा-सा महसूस करता है। आदिवासियों पर जंगल की उपज के उपयोग को वर्जित कर दिया गया। उनका प्रवेश वर्जित हो गया। फलतः आदिवासी विद्रोह पर उतरने को मजबूर हुआ।



सरकार की इच्छा-शक्ति की कमी

सरकार की गलत व कमजोर नीतियों और उन्हें लागू करने में इच्छा-शक्ति की कमी का परिणाम है नक्सलवाद। प्रधानमंत्रि या गृहमंत्री ने नक्सलवादियों को नेस्तानाबूद करने के लिए सेना भेजी। इससे नेस्तानाबूद कौन होंगे? आदिवासी ही न! ये कल्याणकारी समाजवादी संविधान मानने वाली सरकार की सोच नहीं हो सकती। न ही ये लोकतांत्रिक भाषा है। नौकरशाह जब स्थितियों पर काबू नहीं पा सकते, तो प्रायः वे ऐसी भाषा इस्तेमाल करते हैं। आदिवासी भी इसी देश के वासी हंै। उनके प्रति भी नेताओं का दायित्व बनता है। यदि आदिवासी अभी भी भुखमरी की कगार पर हैं, तो इसके लिये दोषी कौन है? देश के नीति-नियंता और देश की नीति ही न! नीति सरकार बनाती है! दरअसल सरकारी नीतियां या तो कमज़ोर होती हैं या ठीक से लागू नहीं की जातीं।



सपना

आखिर नक्सलवादी क्या सपना या सन्देश और भरोसा देते हैं आदिवासियों कोµजब वे उन्हें बन्दूक थमाते हैं? यह सपना है आजादी का राज। संसाधनों पर जनता का कब्ज़ा, समाजवादी व्यवस्था, जंगलों में प्रवेश का अधिकार। पुलिस-प्रशासन के जुल्म, बंधुआगिरी, गुलामी व सूदखोरी से मुक्ति और इज़ारेदारी, ज़मीनदारी, दलाली, विस्थापन, पलायन और घुसपैठ पर रोक का सपना। माओवादी बंदूक की नली से परिवर्तन की उम्मीद करते हैं। इस रास्ते से लोगों का मतभेद हो सकता है। यों आजकल नक्सलियों में भी अपराधियों की घुसपैठ हो रही है। उनमें कुछ ऐसे लोग भी घुस गए हैं, जो पुराने जमींदार हैं और लाइसेंसी बंदूकें रखते हैं। वे अपनी सीमा से अधिक जमीनों और बंदूकों के लाइसेंस बचाने के लिए भी नक्सली आंदोलन से जुड़ गए हैं। अपराधियों को भी पुलिस वाले नक्सलवादी घोषित कर देते हंै, जिससे उन्हें जनता की सहानुभूति मिल जाती है और वे गौरान्वित हो जाते हैं। ऐसे छद्म नक्सलियों की आड़ में अपराध बढ़ता है। आदिवासी की जीवनशैली ही समता, समानता, आजादी, भाइचारे पर आधारित है, इसलिए वह वैसे राज की तरफ खिंचता है, जिसका सपना नक्सली दिखाते हैं। दूसरे दल भी आश्वासन तो ऐसे ही शब्दों में देते हैं, लेकिन सरे-जमीन पर उनके द्वारा जुल्मों का प्रतिकार या समाप्ति की संभावना उन्हें नज़र नहीं आती। नजर आते हैं तो उनके दलाल या रंगदार जो शोषकों से सांठ-गांठ कर लेते हैं। नक्सली उन्हें कुछ देता नहीं है। बस वह उन्हें इन जुल्मों के खिलाफ लड़ने का हौसला देता है और देता है हथियार --यानी बन्दूक और बन्दूक चलाने का प्रशिक्षण! इस बन्दूक से भले बड़ा बदलाव न आया हो, लेकिन क्या यह सच नहीं कि जहां बंदूक पहुंची है, वहां ग्रामीणों, सूदखोरों, दबंगों, सरकारी अफसरों, पटवारियों, थानेदारों का जुल्म कम हुआ है भले भय से ही हो! सरकारी अधिकारी भी शान्ति बनाए रखने के लिए नक्सलियों को लेवी देते हैं पर जनता को राहत देने के लिए उन्हें घूस चाहिए।

झूठ या सचµजनता को अन्ततः नक्सली ही आदिवासी के पक्ष में खड़ा दिखता है। उन्हें लगता है कि वह उनके लिए ही तो लड़ रहा है। यह विश्वास नक्सल आंदोलन अर्जित कर चुका है, पुलिस व प्रशासन के भ्रष्ट अधिकारियों की हत्या करके या उन्हंे भयभीत करके। ‘‘सरकार और उसकी मशीनरी दलालांे का समूह हैµजहां से राहत नहीं मिलतीµउनका शोषण होता है। परिवर्तन तो सोच के दायरे के बाहर है।’’ ये मैं नहीं कह रही, यह आम जनता कहती है। उसकी धारणा हैµ‘‘राजनैतिक दल सत्ता-सुख भोगने के लिए राजनीति करते हैंµबस वोट लेते हैं। बदलाव के लिए नहीं।’’ यह सोच भी आमजन में, खासकर आदिवासी क्षेत्रों में पनप गई है।



हताशा

हताशा भरी यह सोच जनमानस में निर्मित की जा रही है या निर्मित हो रही हैµइसके लिए कौन दोषी है? आखिर नौकरशाही ही न? मीडिया ही न! अथवा दोनों। इसका गहन विश्लेषण किये जाने पर पता लगेगा कि यह सोच कितनी ख़तरनाक है! यह सोच लोकतंत्रा को कमज़ोर करती है। इन धारणाओं को पलटने के लिए तो पहल राजनैतिक दलोंµखासकर सत्ताधीशों को ही करनी होगी? क्यों नहीं सरकार या समाज के दूसरे दल अपना चेहरा वैसा बनाने की कोशिश करते कि आदिवासी उन्हें अपना समझें। सरकार या व्यवस्था में विश्वास की कमी का अर्थ है, चुनी हुई सरकार यानी लोकतंत्रा में विश्वास की कमी! कितना खतरनाक है यह अविश्वास! पर दुर्भाग्यवश यह अविश्वास, हकीकत पर आधारित है।



तन्त्र और पुलिस वर्गशत्रुता  के साथ हैं

यह आदिवासी जनता की त्रासदी है कि पुलिस वर्ग शत्राु के साथ है। तंत्रा भी आम आदमी के विरोध में है खासकर आदिवासी केे। ऐसे में आदिवासियों के समक्ष विकल्प ही क्या बचता है? गाँव में एक तरफ इज़ारेदार, मुनाफ़ाखोर, साहूकार, सामाजिक और राजनीतिक दलालों की भरमार है, जो उसे फुसलाकर लूटने को तैयार रहते हैं, लालच देते हैंµदूसरी तरफ हथियारों से लैस एक जमात उन्हें रास्ता दिखाती हैµ‘तुम खुद ही लड़ो अपनी लड़ाईµलेकिन शान से मरो, मार कर मरो!’ वह जमात उनके सम्मान का वचन देकर उनका अहम् जगाती है और जब प्रताड़नाओं से त्रास्त व्यक्ति, जो रोटी ही नहीं, बल्कि सम्मान और आदर का भी भूखा हैµउसे इज्ज़त और गौरव से मरने का रास्ता मिलता है, तो वह उस राह पर चल पड़ता है। सौदेबाजी करना आदिवासी को आता नहीं है। सामने विकल्प के रूप में एकमात्रा नक्सलवाद ही बचता है, जो कुछ सक्षम दिखता हैµभले सूदखोर, सिपाही, मुखबिर या दलाल का सर काट कर ही क्यों न हो। ‘छः इंच छोटा’ कर देने का बर्बर नारा उन्हें त्रासदी से मुक्ति दिलाने का प्रतीक लगने लगा है। इस सोच में लोकतंत्रा तो बचता ही नहीं। इसका जिम्मेदार कौन है? क्या केवल नक्सलवाद? यदि प्रशासन तंत्रा या राजनैतिक दल उसे मुक्तिदाता या पक्षधर के रूप में नज़र आता, तो नक्सलवाद पनपता ही क्यों!



सत्ता गंवा कर परिवर्तन की बात कोई पार्टी नहीं करती

इसे झारखंड का दुर्भाग्य कहें या आदिवासी बहुल राज्यों का। इन राज्यों में मुख्यमंत्राी भले ही आदिवासी होते रहे हैं, पर मुख्यमंत्राी बनाने की डोर सदैव गैरआदिवासी शक्तियों के हाथों में रहती रही है। आज की चुनाव प्रणाली में आदिवासी या दलित प्रतिनिधि को गैरदलित जमात पर निर्भर रहना पड़ता है, जो उनका शोषण करती है। झारखंड में स्वायत्त शासन के माध्यम से 60 प्रतिशत प्रतिनिधित्व आदिवासियों को ही मिलना चाहिए था। कम्युनिस्ट पार्टी माक्र्सवादी इसी नीति की पक्षधर थी, क्योंकि इससे आदिवासी अपने विकास के फैसले स्वयं कर सकते। लोकतंत्रा में बहुसंख्यक की चलती है। आज की स्थिति में आदिवासियों को बहुसंख्यकांे के अधिकारों से सरकार ही लैस कर सकती है। त्रिपुरा में ऐसा प्रयास कामयाब भी हुआ है। वहां पूरे देश के अनुपात में सबसे अधिक जंगल हैं। उनका क्षेत्राफल भी बढ़ा है चूंकि उनके इंतजाम में आदिवासी भी सहयोगी हैं।

झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश या किसी अन्य आदिवासी बाहुल्य राज्य के औद्योगीकरण का मामला हो या अधिगृहित की गई ज़मीनों के बदले पुनर्वास काµऐसे मामले किसी भी मुख्यमंत्राी के अकेले वश की बात नहीं होते। इसके लिए पूरे मंत्राीमंडल और केंद्रीय सरकार की भी स्वीकृति की दरकार होती है। बदलाव, शोषण और विस्थापन जैसे मुद्दों को हल करने के लिए भारी बहुमत और दृढ़ इच्छाशक्ति और जरूरत पड़ने पर कठोर एवं अप्रिय कदम उठाने की ज़रूरत होती है। ये प्रदेश तो क्या, पूरे देश में सत्ता गंवाकर परिवर्तन करने की हिम्मत अभी तक कोई भी पार्टी नहीं दर्शा सकी है।

फिर अल्पमत या निर्दलियों के भरोसे चलने वाली सरकारों की क्या विसात की परिवर्तन ला सकें? वोट की चिन्ता से मुक्त, प्रतिबद्ध समाज व सरकार ही परिवर्तन ला सकती है। लेकिन दुर्भाग्यवश हमारी सरकारें वोट से संचालित होती हैं और हमारा समाजµजड़-रूढ़ियों, परम्पराओं, अवैज्ञानिक सोच, अन्धविश्वास और श्रेष्ठ-अश्रेष्ठ व लाभ आधारित संस्कृति व धर्म का कायल हैµजो सामाजिक अन्याय की नींव पर निर्मित है। आदिवासी समाज की संरचना मूलतः बराबरी, भाइचारा, आजादी और सामूहिकता है और शेष भारत (सत्ताधीशों सहित) की मानसिकता, विभेदकारी व व्यक्तिवादी, सामन्ती संस्कृति की पोषक है। इसका कारण उनकी संस्कृति का श्रेष्ठता आधारित धर्म व भेदभाव-मूलक होना भी है।



विकल्प की तलाश में हाथ लगा नक्सलवाद

फिर विकल्प क्या हो? क्या आज़ादी के इतने सालों बाद भी कोई राजनैतिक दल विकल्प खड़ा कर पाया? हुआ तो यह है कि राजनीति में भ्रष्टाचार आज कोई मुद्दा ही नहीं रहा! लेकिन आदिवासी जनता अभी भी राजनैतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार को मुद्दा मानती है, क्योंकि वह इससे त्रास्त है। फलतः उन्हें बंदूक सहज लगी, तो वे उधर चले गए। आदिवासी से बड़ा लोकतंत्रावादी विश्व में कोई दूसरा समाज नहीं है। यह हमारी कमजोरी है कि हम अपने स्वार्थ के चलते उन्हें लोकतंत्रा से विमुख कर रहे हैं। सामूहिक अवज्ञा आन्दोलन या सत्याग्रहों की उपेक्षा करके, हमारे सत्ताधीश ही जनता को इनसे विमुख कर हथियार उठाने को मजबूर करते रहे हैं। मुझे आज भी याद है जब विस्थापितों की समस्या पर 1980-81 में हम दो हजार लोगों के साथ गिरफ्तारी दिए और ‘खेत को खदान में बदलना बन्द करोµपुनर्वास करो’ का आन्दोलन चलाए, तो सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप कर खनन तो बन्द करवाया था, किन्तु केन्द्र सरकार के सर पर जूं तक नहीं रंेगी थी। आज यही विस्थापित भूमिहीन किसानों की एक बड़ी जमात बनकर खड़े हैं और हथियार उठाने को मजबूर हैं। इसका समाधान तो उन्हें जमीन और जंगल के अधिकार देकर ही हो सकता है।



संसाधनों पर पूर्ण अधिकार का समाधान

परियोजना बनने और विस्थापन से पहले उनका समुचित पुनर्वास, प्रस्थापित होने वाले उद्योगों में उनके रोजगार की सुनिश्चित व्यवस्था, आदिवासियों को उनकी ज़मीन, जंगल, जल और संसाधनों पर पूर्ण अधिकार, रोजगार की गृह राज्य में गारंटी, उद्योगों में साझीदारी मिले, तभी उनका विस्थापन और पलायन रुक सकता है। जंगल की रखवाली उन्हें सौंप दी जाय तो जंगलों की अवैध कटाई भी रुक जाएगी। उनके लिए ज़मीन और सिचाई की व्यवस्था कर दी जाए, तो पलायन रुक जाएगा, चूंकि आदिवासी मूलतः किसान है। वह अपने घर के पिछवाड़े बाड़ी में, जंगल, नदियों के पेट, पहाड़ों की ढलानों और पठारों के मैदानों में खेती करके खुश हैµआदिवासी का अस्तित्व और समृद्धि, जंगल और ज़मीन से नालबद्ध है।

मेरा दृढ़ मत है कि बंदूक का विकल्प हम उनके पास लेकर जाएं, तो वे ज़रूर लौटेंगे!


शनिवार, 16 जनवरी 2010

इस सोच के पीछे कौन?

इस सोच के पीछे कौन?





यह फाउंडेशन श्रीमती रमणिका गुप्ता का मानस-शिशु है जो एक महत्वपूर्ण सामाजिक व्यक्तित्व हैं और जिन्होंने सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को नई पहलकदमियों की शृंखला के माधयम से एक नया आयाम दिया है। उनकी इच्छा, उनका दृढ़ निश्चय और उनकी योग्यता ने औरों को भी मानवीय कारणों से फाउंडेशन को, गूंगे को आवाज़ देने वाला एक शक्तिशाली और लोकप्रिय मंच बनाने के लिए प्रेरित किया है। बचपन से ही विद्रोही वे बहुआयामी व्यक्तित्व की धनी हैं। आज वे एक सामाजिक कार्यकर्ता, संस्कृतिकर्मी, समकालीन हिन्दी साहित्य की महत्वपूर्ण लेखिका-कवयित्री और एक श्रमिक नेता के रूप में ख्यात और प्रतिष्ठित हैं। उनकी गतिविधियां और समर्पण ऊपरी तौर पर भले ही बिखरीं और उग्र या दुष्कर लगें लेकिन जो भी गहराई में जाकर विचार करेगा वह महसूस करेगा कि आदिवासी, दबे-कुचले व वंचित समाज के बेहतर भविष्य के आदर्श से उनका जीवन-दर्शन जुड़ा हुआ एवं प्रभावित है। सामान्य आदमी की योग्यता और अच्छाई में उनका अदम्य विश्वास है। वे मानती हैं कि हर प्रकार के अन्याय को बढ़ावा देने और उसे वैधानिकता प्रदान करने वाले पारंपरिक वंशानुगत सामाजिक वर्गीकरण को नष्ट करने में जनसाधारण महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा। श्रमिक आंदोलन के प्रमुख पैरोकार के रूप में पैंतीस वर्षों से झारखंड के छोटानागपुर क्षेत्र में आदिवासियों, दलितों एवं स्त्रियों के अधिकार के लिए वे एक अंतहीन संघर्ष छेड़े हुए हैं। वहां घर-घर में लोग उन्हें जानते हैं। वे वाम-लोकतांत्रिक संगठन से जुड़ी हुई हैं और विधान सभा तथा विधान परिषद में दलितों का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि आज के दौर में जबकि लोगों का निजी जीवन और सामाजिक जीवन में परस्पर मेल कठिन है, उनका मौलिक जीवन-दर्शन और जीवन-व्यवहार एक समान है। उनका जीवन हर प्रकार के अन्याय और अतीतोन्मुख व्यवहार के खिलाफ एक जंग है। 1948 में किए अपने अंतर्जातीय विवाह और समाज तथा परिवार के वर्चस्व के खिलाफ वैयक्तिक स्वतंत्रता और जगह के लिए उन्होंने संघर्ष किया। उन्होंने कभी भी पुरानी अनुपयोगी परंपराओं का आदर नहीं किया।



सामाजिक बदलाव की उनकी इच्छा, उनका दृढ़ निश्चय और व्यग्रता फाउंडेशन की बहुआयामी गतिविधियों से प्रकट लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित है। अपने लेखकीय जीवन में उन्होंने गद्य एवं पद्य विधा की कई महत्वपूर्ण किताबें लिखीं जिसमें उपेक्षितों खासकर आदिवासी और दलित स्त्रियों के प्रति प्रेम और आदर झलकता है, जो उन्हें हृदय से प्रिय हैं। यह उनकी पत्रिका 'युध्दरत आम आदमी' के नाम से ही प्रकट होता है जिसका शाब्दिक अर्थ है 'अपने अस्तित्व के प्रति संघर्षरत आम आदमी।' इस ख्याति प्राप्त पत्रिका का वे वर्षों से कुशल संपादन करती आ रही हैं। उनकी पत्रिका न केवल लोकप्रिय सामाजिक-संस्कृति मुद्दों और गरीबों की समस्या को उठाती हैं बल्कि यह बात भी रेखांकित करने लायक है कि उनके सहयोगी लेखक भी अधिकतर दलित, कमजोर और वंचित दलित आदिवासी समुदाय के ही होते हैं। उन रचनाकारों को हिंदी साहित्य में किसी से भी ज्यादा प्रकाशन और अपनी पत्रिका में गौरवपूर्ण स्थान देकर उन्होंने दलित-आदिवासी व महिला लेखकों के मुद्दों को उठाया है।



'युध्दरत आम आदमी' के तेलुगु, गुजराती और पंजाबी साहित्य में दलित लेखन पर केंद्रित विशेषांक और ग्यारह क्षेत्रीय भाषाओं के लेखकों द्वारा आदिवासी लेखन पर दो खंडों में 'आदिवासी स्वर और नई शताब्दी' विशेषांक उल्लेखनीय कार्य हैं। रमणिका जी ने नाटक, कथा साहित्य एवं विश्लेषणात्मक दलित खंडों का हिन्दी और अहिन्दी भाषाओं में परस्पर अनुवाद कार्य के अलावा, दलित लेखन पर आलोचनात्मक कार्य भी किया है। उन्होंने यह सब दलित-आदिवासी प्रतिभाओं को राष्ट्रीय नेटवर्क प्रदान करने के लिए किया है और सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से बेहद जरूरतमंद वर्गों में जागरूकता फैलाने की तरफ लोगों के धयानाकर्षण के लिए प्रेरक की भूमिका निभाई है।



दरअसल उनकी सारी रचनात्मक ऊर्जा और भौतिक स्रोत, उनका समय और उनकी जगह, एक बड़े सामाजिक लक्ष्य से जुड़े हुए हैं। ऐसे में जबकि वे लंबे हृदय रोग के कारण जीवन के लिए संघर्ष कर रही हैं उनका धौर्य और संघर्ष अंधोरे में रोशनी जलाने की तरह अपने आप में अनूठा है। अपने सपनों को सच करने के लिए वे पूरी जीवंतता, उत्साह और उम्मीद के साथ निरंतर मिशनरी भावना से कार्य करती हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि डिफेंस कॉलोनी स्थित उनका घर जहां से वे अभी संगठन के सारे काम चलाती हैं देश भर के दलित-आदिवासी बौध्दिकों और कार्यकर्ताओं का प्रिय शिविर बन गया है। सचमुच आज वे युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत और आदर्श बन गई हैं और विभिन्न क्षेत्रों-स्तरों से आने वाले युवाओं को आत्मिक प्रेम, स्नेह देकर उनका उत्साह बढ़ाते हुए उनमें नेतृत्व एवं सांगठनिक क्षमता विकसित करती हैं क्योंकि उनका कहना है ''यह तो संघर्ष की शुरुआत है...''

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